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परिचय

एंजियोप्लास्टी की पारंपरिक तकनीक में stent डालना आम है, लेकिन अब एक नई, मेटल-फ्री विकल्प उपलब्ध है: स्टेंटलेस एंजियोप्लास्टी या ड्रग-कोटेड बलून (DCB) विधि — जिसे अक्सर “लिव नथिंग बिहाइंग” कहा जाता है। इस तरीके में धमनियों के अंदर कोई स्थायी धातु नहीं छोड़ी जाती। इसका उद्देश्य ब्लॉकेज को ठीक करना है जबकि भविष्य में स्टेंट से जुड़े जटिलताओं को कम करना है।

स्टेंटलेस एंजियोप्लास्टी क्या है?

स्टेंटलेस एंजियोप्लास्टी में सबसे पहले एक साधारण बैलून के माध्यम से ब्लॉकेज को फैलाया या तोड़ा जाता है। उसके बाद वही बैलून या एक अलग बैलून जो ऊपर से दवा से कोटेड होता है, उसे प्रभावित क्षेत्र पर कुछ समय के लिए लगाए रखते हैं ताकि दवा सीधे रक्त वाहिनी की दीवार में प्रवेश कर सके। यह दवा सूजन और कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि को रोकती है, जिससे पुनः रुकावट (रेस्टेनोसिस) के जोखिम को कम किया जा सके।

ड्रग-कोटेड बलून में सामान्यतः किस तरह की दवा होती है?

ड्रग-कोटेड बलून पर एनी-प्रोलिफेरेटिव दवा रहती है, जो कोशिकात्मक वृद्धि को रोकती है। क्लिनिकल प्रैक्टिस में पॅक्लिटॅक्सल जैसी दवाओं का उपयोग आम होता है ताकि दवा शिरा की दीवार में प्रवेश करके पुनररुद्धि को रोके।

यह कैसे काम करता है — कदम दर कदम

  1. पहला कदम: कैथेटर और सामान्य बैलून के जरिए संकुचित हिस्से को ठीक से फैलाया जाता है और प्लैक हटाने या तोड़ने का प्रयास किया जाता है।
  2. दूसरा कदम: ड्रग-कोटेड बलून प्रभावित क्षेत्र पर रखा जाता है और कुछ सेकंड से मिनट तक दवा को दीवार में ट्रांसफर किया जाता है।
  3. तीसरा कदम: बलून निकाल दिया जाता है और किसी भी जरूरत के हिसाब से मरीज की दवा-नीति और निगरानी तय की जाती है।

स्टेंटलेस एंजियोप्लास्टी के प्रमुख फायदे

इस तकनीक के कई नैदानिक लाभ हैं, जिनकी वजह से कुछ मामलों में यह पारंपरिक स्टेंटिंग से बेहतर विकल्प बन सकती है:

  • मेटल नहीं रहता — अंतःस्थापित धातु न होने से दीर्घकालिक धातु-संबंधी जटिलताएं नहीं होती।
  • स्टेंट से बचाव — एक ही क्षेत्र में कई स्टेंट लगाने की ज़रूरत नहीं पड़ती; कई ब्लॉकेज में स्टेंट की तुलना में आसान विकल्प हो सकता है।
  • एंटीप्लेटलेट दवाओं की अवधि कम हो सकती है — कई मामलों में ब्लीडिंग जोखिम वाले मरीजों में रक्त पतला करने वाली दवाओं को जल्दी बंद किया जा सकता है।
  • कम ब्लीडिंग का ख़तरा — लंबे समय तक डुअल एंटीप्लेटलेट थेरेपी (DAPT) की ज़रूरत घटने पर ब्लीडिंग से जुड़ी समस्याएँ कम होती हैं।
  • स्टेंट थ्रोम्बोसिस व री-ब्लॉकेज के मौके कम — स्टेंट में क्लॉट बनने के जोखिम और पुनःरूद्धि की घटनाएँ घटती हैं; पारंपरिक स्टेंट के साथ देखा जाने वाला लगभग 5% का री-ब्लॉकेज का आँकड़ा कुछ स्थितियों में घट सकता है।

किसके लिए उपयुक्त है?

स्टेंटलेस एंजियोप्लास्टी हर रोगी के लिए नहीं होती। यह विशेष रूप से उन मरीजों के लिए उपयोगी है जिनमें:

  • छोटी या डिफ्यूज रक्त वाहिनियाँ हों
  • कई साइट्स पर ब्लॉकेज हों और बहुत सारे स्टेंट लगाने से बचना हो
  • उच्च रक्तस्राव जोखिम (high bleeding risk) हो, जहाँ लंबी DAPT सुरक्षित न हो
  • वह स्थिति हो जहाँ भविष्य में इंटरवेंशन की संभावनाएँ बनी रहें और स्थायी मेटल न छोड़ना बेहतर समझा जाए

सीमाएँ और संभावित जोखिम

कई लाभों के बावजूद, सीमाएँ और जोखिम हैं जिन पर ध्यान देना जरूरी है:

  • भारी कैल्सिफाइड या बहुत अधिक रीकॉइल वाले लेशन्स में स्टेंट की आवश्यकता पड़ सकती है क्योंकि बलून फैलाने पर धमनी में डिसेक्शन (चीर) या रीकॉइल हो सकता है।
  • बहुत लंबी संकुचित धारियों में परिणाम संतोषजनक नहीं हो सकते; ऐसे मामलों में स्टेंट बेहतर रहता है।
  • सभी प्रकार की धमनियों और सभी मरीजों में इसका अनुभव समान नहीं है — निर्णय केस-बाय-केस लिया जाता है।

एफ़्टरकेयर और फॉलो-अप

प्रोसीज़र के बाद मरीज की दवा और निगरानी व्यक्तिगत रोगनिदान पर निर्भर करेगी। कई الحالات में एंटीप्लेटलेट थेरेपी की अवधि कम की जा सकती है, पर यह पूरी तरह रोगी की जोखिम-आधारित रणनीति पर निर्भर करता है। नियमित कार्डियोलॉजिकल फॉलो-अप और आवश्यक इमेजिंग जांचें सुझाई जा सकती हैं ताकि पुनःरुद्धि या अन्य जटिलताओं की तत्काल पहचान हो सके।

 

निष्कर्ष

स्टेंटलेस एंजियोप्लास्टी एक उभरती हुई, उपयोगी तकनीक है जो कई मरीजों में “लीव नथिंग बिहाइंग” के सिद्धांत पर काम करती है। यह उन रोगियों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद हो सकती है जिनमें मेटल छोड़ना समस्याग्रस्त हो, या जहाँ लंबे समय तक रक्त पतला करने वाली दवाओं से जोखिम अधिक हो।

फैसला हमेशा व्यक्तिगत स्थिति, धमनियों के आकार और प्रकृति, रोगी के जोखिम प्रोफाइल और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट की क्लिनिकल जजमेन्ट पर आधारित होना चाहिए। सही मरीज चुनने पर यह तकनीक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प साबित हो सकती है।